आरती संग्रह

आरती संग्रह

विभिन्न देवी-देवताओं की आरतियाँ

!! श्री हनुमान जी की आरती !!

आरती कीजै हनुमान लला की।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की।।

जाके बल से गिरिवर कांपे।

रोग दोष जाके निकट न झांके।

अंजनि पुत्र महाबलदायी।

संतान के प्रभु सदा सहाई।।

दे बीरा रघुनाथ पठाए।

लंका जारी सिया सुध लाए।।

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।

जात पवनसुत बार न लाई।।

लंका जारी असुर संहारे।

सियारामजी के काज संवारे।।

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।

आणि संजीवन प्राण उबारे।।

पैठी पताल तोरि जमकारे।

अहिरावण की भुजा उखाड़े।।

बाएं भुजा असुर दल मारे।

दाहिने भुजा संतजन तारे।।

सुर-नर-मुनि जन आरती उतारे।

जै जै जै हनुमान उचारे।।

कंचन थार कपूर लौ छाई।

आरती करत अंजना माई।।

जो हनुमानजी की आरती गावै

बसी बैकुंठ परमपद पावै।।

लंकविध्वंस कीन्ह रघुराई।

तुलसीदास प्रभु कीरति गाई।।

!! रुद्राष्टकम !!

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ॥ १ ॥

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम् ॥ २ ॥

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं

गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ॥ ३ ॥

करालं महाकालकालं कृपालं

गुणागारसंसारपारं नतोहम् ॥ ४ ॥

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं

मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ॥ ५ ॥

स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ६ ॥

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ॥ ७ ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं

प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥ ८ ॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥ ९ ॥

त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं

भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ १० ॥

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ॥ ११ ॥

चिदानन्दसंदोह मोहापहारी

प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ १२ ॥

न यावद् उमानाथपादारविन्दं

भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ॥ १३ ॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥ १४ ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ॥ १५ ॥

जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥ १६ ॥

!! गणेश जी की आरती !!

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा

माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी

माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ।। १ ।।

जय गणेश...

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया

बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ।। २ ।।

जय गणेश...

पान चढ़े, फूल चढ़े, और चढ़े मेवा

लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ।। ३ ।।

जय गणेश...

दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतवारी

कामना को पूरा करो, जाऊं बलिहारी ।। ४ ।।

जय गणेश...

!! गणपति जी की आरती !!

गणपति की सेवा मंगल मेवा,

सेवा से सब विघ्न टरैं।

तीन लोक तैंतीस देवता,

द्वार खड़े अरज अर्ज करैं॥

रिद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजें,

अरु आनन्द सों चमर करैं।

धूप-दीप अरू लिए आरती

भक्त खड़े जयकार करैं ॥ १ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...॥

गुड़ के मोदक भोग लगत हैं

मूषक वाहन चढ्या करें

सौम्य रूप सेवा गणपति की

विघ्न भाग जा दूर परैं ॥ २ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...

भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थी

दिन दोपारा दूर परैं।

लियो जन्म गणपति प्रभु जी ने

दुर्गा मन आनन्द भरैं ॥ ३ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...

देखत वेद ब्रह्मा जी जाको

विघ्न विनाशक नाम धरैं॥

एकदंत गजबदन विनायक

त्रिनयन रूप अनूप धरे॥ ४ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...॥

पगथंभा सा उदर पुष्ट है

देव चन्द्रमा हास्य करैं॥

दियो श्राप श्री चंद्र देव को

कलाहीन तत्काल करे ॥ ५ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...॥

चौदह लोक में फिरें गणपति

तीन लोक में राज्य करैं॥

उठी प्रभात जब आरती गावे

ताके के सिर यश छत्र फिरे॥ ६ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...

गणपति पूजा पहले करनी

काम सभी निर्विघ्न सरैं।

श्री प्रताप गणपति जी को

हाथ जोड़कर स्तुति करैं॥ ७ ॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा...॥

!! माँ दुर्गा की आरती !!

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी

तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी

माँग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को

उज्जवल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजे

रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजे

केहरी वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी

सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी

कानन कुंडल शोभित, नासाग्रे मोती

कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योति

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती

धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे

ब्रह्माणी रुद्राणी तुम, कमला रानी

अगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूं

बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भर्ता

भक्तन की दुःख हरत, सुख संपत्ति करता

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी

मनवांछित फल पावत, सेवत नर-नारी

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति

श्री अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे

कहत शिवानन्द स्वामी, जपत हरोहर स्वामि मनवांछित फल पावे

!! आरती कुंजबिहारी की !!

।। आरती कुंजबिहारी की ।।

।। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

गले में बैजंती माला बजावै मुरली मधुर बाला

श्रवण में कुण्डल झलकाला नंद के आनंद नंदलाला

गगन सम अंग कांति काली

राधिका चमक रही आली

लतन में ठाढ़े बनमाली

भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक,

ललित छवि श्यामा प्यारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

।। आरती कुंजबिहारी की ।।

।। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,

देवता दरसन को तरसैं

गगन सों सुमन रासि बरसै

बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग,

अतुल रति गोप कुमारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

।। आरती कुंजबिहारी की ।।

।। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

जहां ते प्रकट भई गंगा,

सकल मन हारिणि श्री गंगा ।

स्मरन ते होत मोह भंगा

बसी शिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच,

चरन छवि श्रीबनवारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

।। आरती कुंजबिहारी की ।।

।। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,

बज रही वृंदावन बेनू ।

चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू

हंसत मृदु मंद, चांदनी चंद, कटत भव फंद,

टेर सुन दीन दुखारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

।। आरती कुंजबिहारी की ।।

।। श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ।।

!! श्री शिव जी की आरती !!

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा।।

एकानन चतुरानन पंचानन राजे

हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे।। १।।

दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे,

त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे।। २।।

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी।। ३।।

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे

सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे।। ४।।

कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धर्ता,

सुखकर्ता दुखहर्ता जगपालन कर्ता।। ५।।

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका,

प्रणवाक्षर के मध्ये यह तीनों एका।। ६।।

पार्वती पर्वत पे विराजे शंकर कैलाशा,

भांग धतूर की भोजन भस्मी में रमता।। ७।।

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।

नित उठ दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगवात महिमा अति भारी।। ८।।

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, जपत हरोहर स्वामी मनवान्छित फल पावे।। ९।।

शिव ओंकारा शिव ओंकारा हर ऊंकारा,

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।।