श्री रामाष्टक
प्रतिदिन शाम 7:30 - 8:00 बजे
!! श्री रामाष्टक !!
हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशव
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्।।
आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव सम्भाषणम्।।
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतदधि रामायणम्।।
!! श्री सीताराम जी की स्तुति !!
श्री राम चंद्र कृपालु भजमन
हरण भाव भय दारुणम्।
नवकंज लोचन कंज मुखकर,
कंज पद कन्जारुणम्।।
कंदर्प अगणित अमित छवी
नव नील नीरज सुन्दरम्।
पट्पीत मानहु तडित रूचि
शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।
भजु दीन बंधु दिनेश दानव
दैत्य वंश निकंदनम्।
रघुनंद आनंद कंद कौशलचंद्र
दशरथ नन्दनम्।।
सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु
उदारू अंग विभूषणं।
आजानु भुज शर चाप धर
संग्राम जित खर-धूषणं।।
इति वदति तुलसीदास शंकर
शेष मुनि मन रंजनम्।
मम ह्रदय कुंज निवास कुरु
कामादी खल दल गंजनम्।।
!! जय जनक नंदिनी !!
जय जनक नंदिनी जगत वंदिनी
जग आनंदनि श्री जानकी
रघुवीर नयन चकोर चन्दिनी
श्री वल्लभा प्रिय प्राण की
तब कंज पद मकरंद स्वादित
योगी जन मन अलि किये
करि पान गिनत हि आनहि
निर्वाण सुख आनत हिए
सुख खानि मंगल जानि जड़
जिय जानि शरण जो जात है
तब नाथ सब सुख साथ करि
तेहि हाथ रिझि विकात है
ब्रह्मादि शिव सनकादि सुरपति
आदि निज मुख भाषाई
तव कृपा नयन कटाक्ष चितवन
दिवस निश अभिलाषहि
तनु पाई तुमहि बिहाय जड़मति
आन मानस सेवहि
हतभाग्य सूरतरूत्याग करी
अनुराग रेड़ही सेवही
यह आस रघुवर दास की
सुख आस पूरन कीजिये
निज चरण कमल सनेह
जनक विदेहजा वर दीजिए
महाराज करि करुणा बिलोकहु
देहु जो वर माँगहु
जेहि जोनि जन्महुँ कर्म बसतह
रामजी पद अनुरागहु
मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो
बरु सहज सुंदर सावरों।
करुना निधान सुजान सिलू
सनेहू जानत रावरो।।
एही भांती गौरी असीस सुनी
सिय सहित हिय हरषी अली।
तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी
मुदित मन मंदिर चली।।
जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।
!! श्री राम स्तुति !!
मो सम दीन न दीन हित तुम समान रघुवीर
अस विचार रघुवंशमणि हरऊ विषम भवभीर
कामहि नारि पियारि जिमि लोभही प्रिय दाम
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम
प्रनत पाल रघुवंशमणि करूणा सिंधु खरारि
गए सरन प्रभु राखिहै तव अपराध बिसार
श्रवण सुजसु सुनि आयऊ प्रभु भंजन भव भीर
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुवीर
अर्थ न धर्म न कर्म रूचि गति न चढ़ऊ निर्वाण
जनम जनम सियरामजी पद यही वर मागहु आन
बार बार वर मागऊ हरषि देहु श्रीरंग
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग
बरनि उमापति रामजी गुन हरषि गयऊ कैलाश
तब प्रभु कपिन्ह दिवायऊ सबविधि सुखप्रद बास
एक मंद मे मोहबस कुटिल हृदय अग्यान
पुनि प्रभु मोहि न बिसारेहु श्रीदीनबंधु भगवान
विनती कर मुनि नाय सिर कह कर जोरि बहोरि
चरण सुमिरि रघुनाथ जिमि कबहु न तजि मतिमोर
नहि विद्या नही बाहुबल नही खरचन को दाम
मो से पतित अपंग के तुम पति राखौ राम
कोटि कल्प काशी बसै मथुरा कल्प हजार
एक निमिष बसै तुलै न तुलसीदास
रामजी नगरिया राम की बसै सरयू के तीर
अटल राज महाराज की चौकी हनुमत वीर
कहा कहौ छवि आज की भले विराजो नाथ
तुलसी मस्तक तब नवै धनुष बाण लियो हाथ
कित मुरली कित चंद्रिका कित गोपियन के साथ
अपने जन के कारज श्रीकृष्ण भये रघुनाथ
अवध धाम धामादि पति अवतारन पति राम
सकल सिध्द पति जानकी दासन्ह पति हनुमान
कह कर धनुष चढ़ाइये चकित भये सब भूप
मग्न भयि सिय जानकी देख रामजी को रूप
चित्रकूट माणिक भवन भवर करायि गुंजाई
दुल्हिनि रानि जानकी दूल्हा राजकुमार
रामबाम दिसि जानकी लखन दाहिनी ओर
ध्यान सकल कल्याणमय सुर तरू तुलसी तोर
राम नाम की आलसी भोजन के उसियार
विघ्न पुष्प भादौ नदी किस वित उतरही पार
राम नाम की आलसी भोजन के उसियार
तुलसी ऐसे जीव को बार बार धिक्कार
अजगर करही न चाकरि पंछी करहि न काज
दास मनोका यो कहे सब के दाता राम
अस प्रभु दीन बंधु हरि कारनरहित दयाल
तुलसी दास सठ तेहि भजु छाड़ कपट जंजाल
एक घड़ी आधी घड़ी आधी मे पुनि आध
तुलसी संगत साधु की हरै कोटि अपराध
!! स्तुति !!
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम
पाणौ महासायकचारूचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम
भवाब्धिपोतम् भरताग्रजान्तं भक्तिप्रियम् भानुकूलं प्रदिपम्
भूताधिनाथं भुवनाधिपत्यं भजामि रामं भवरोगवैद्यम्
लोकाभिरामं रणरङ्गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्
कारुण्यरुपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या द्रविणम् त्वमेव त्वमेव सर्वम् मम देव देव
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभ्यहरं सर्वलोकैकनाथम्
अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे
राम राम राम राम नाम तारकम् राम कृष्ण वासुदेव भक्ति मुक्ति दायकम्
शङ्करादि सेव्यमान पुण्यनाम कीर्तनम् जानकी मनोहरम श्रीरामचन्द्रं भजे
!! श्री हनुमान चालीसा !!
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजमन मुकुरु सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुण्डल कुँचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजे। कांधे मूंज जनेउ साजे।।
शंकर सुवन केसरी नंदन। तेज प्रताप महा जग वंदन।।
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचन्द्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरे सब पीरा। जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।। असुर निकन्दन राम दुलारे।।
अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुह्मरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै।।
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
सङ्कट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जय जय जय हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बन्दि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
!! श्री शंकर भगवान की आरती !!
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा।।
एकानन चतुरानन पंचानन राजे
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे।।
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे,
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे।।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी,
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी।।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे।।
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धर्ता,
सुखकर्ता दुखहर्ता जगपालन कर्ता।।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका,
प्रणवाक्षर के मध्ये यह तीनों एका।।
पार्वती पर्वत पे विराजे शंकर कैलाशा,
भांग धतूर की भोजन भस्मी में रमता।।
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत रुचि रुचि भोग लगवात महिमा अति भारी।।
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, जपत हरोहर स्वामी मनवान्छित फल पावे।।
शिव ओंकारा शिव ओंकारा हर ऊंकारा,
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्द्धांगी धारा।।
!! श्री शंकर आरती एवं दोहे !!
श्री गुरु चरण सरोज रज निज मनु मुखर सुधार
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।
सिया वर रामचन्द्र शंकर हरिओम जय जय सिया राम जय हनुमान
बुद्धि हीन तनु जनिके सुमिराहू पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं हरहु कलेस विकार।।
पावन तनय संकट हरण मंगल मूर्ति रूप।
राम लक्ष्मण सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप।।
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट।
अंत काल पछताएगा प्राण जायेंगे छूट।।
राम किसीको मारे नहीं सबके दाता राम।
आपने आप मर जाएंगे करके कोटे काम।।
राम नाम रटते रहो धरे रहो मन धीर।
कारज वही सुधारेंगे कृपा सिंधु रघुवीर।।
चित्रकूट के घाट पे भई संतन की भेंट।
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुवीर।।
जय जय राजा राम की जय लक्ष्मण बलवान।
जय कपीस सुग्रीव की जय अंगद हनुमान।।
शिव समान दाता नहीं विपत निवारण हार।
लज्जा मोरी राखियो नंदी के असवार।।
!! जय घोष !!
रामचन्द्र भगवान की जय
जानकी मैया की जय
लखनलाल की जय
शंकर भगवान की जय
पार्वती मैया की जय
गणपति महाराज की जय
कार्तिके भगवान की जय
नंदी महाराज की जय
हनुमान जी महाराज की जय
लड्डू गोपाल जी महाराज की जय
रामायण मैया की जय
तुलसी मैया की जय
गौ मैया की जय
गंगा मैया की जय
नर्मदा मैया की जय
यमुना मैया की जय
सरस्वती मैया की जय
श्री तुलसीदास जी महाराज की जय
श्री रामकुमारदास जी महाराज की जय
श्री रामकिशनदास जी महाराज की जय
श्री रामकिंकरदास जी महाराज की जय
संत श्री सिंगाजी महाराज की जय
धूनीवाले दादा की जय
भ्रमगीर महाराज की जय
सभी संतो की जय
अपने अपने गुरुदेव की जय
मात-पिता की जय
धर्म की जय
अधर्म का नाश हो
प्राणियों में सद्भावना हो
विश्व का कल्याण हो
सत सनातन धर्म की जय
आज के आनंद की जय
नमो पार्वती पते हर हर महादेव
!! शंभू !!
!! जय जय सीताराम !!