ॐ जय जगदीश हरे
प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे
!! ॐ जय जगदीश हरे !!
ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट
क्षण में दूर करे
जो ध्यावे फल पावे
दुख बिनसे मन का
स्वामी दुख बिनसे मन का
सुख सम्पत्ति घर आवे
सुख सम्पत्ति घर आवे
कष्ट मिटे तन का
मात पिता तुम मेरे
शरण गहूं किसकी
स्वामी शरण गहूं किसकी
तुम बिन और न दूजा
तुम बिन और न दूजा
आस करूं जिसकी
तुम पूरण परमात्मा
तुम अंतर्यामी
स्वामी तुम अंतर्यामी
पारब्रह्म परमेश्वर
पारब्रह्म परमेश्वर
तुम सबके स्वामी
तुम करुणा के सागर
तुम पालनकर्ता
स्वामी तुम पालनकर्ता
मैं मूरख खल कामी
मैं मूरख खल कामी
कृपा करो भर्ता
तुम हो एक अगोचर
सबके प्राणपति
स्वामी सबके प्राणपति
किस विधि मिलूं दयामय
किस विधि मिलूं दयामय
तुमको मैं कुमति
दीनबंधु दुखहर्ता
ठाकुर तुम मेरे
स्वामी ठाकुर तुम मेरे
अपने हाथ उठाओ
अपने हाथ उठाओ
द्वार पड़ा तेरे
विषय विकार मिटाओ
पाप हरो देवा
स्वामी पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ
सन्तन की सेवा
ॐ जय जगदीश हरे
स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट
क्षण में दूर करे
!! श्रीराम स्तुति !!
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला,
कौसल्या हितकारी ।
हरषित महतारी, मुनि मन हारी,
अद्भुत रूप बिचारी ॥
लोचन अभिरामा, तनु घनस्यामा,
निज आयुध भुजचारी ।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला,
सोभासिंधु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी, अस्तुति तोरी,
केहि बिधि करूं अनंता ।
माया गुन ग्यानातीत अमाना,
वेद पुरान भनंता ॥
करुना सुख सागर, सब गुन आगर,
जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी, जन अनुरागी,
भयउ प्रगट श्रीकंता ॥
ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया,
रोम रोम प्रति बेद कहै ।
मम उर सो बासी, यह उपहासी,
सुनत धीर मति थिर न रहै ॥
उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना,
चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै ।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई,
जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ॥
माता पुनि बोली, सो मति डोली,
तजहु तात यह रूपा ।
कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला,
यह सुख परम अनूपा ॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना,
होइ बालक सुरभूपा ।
यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं,
ते न परहिं भवकूपा ॥
बिप्र धेनु सुर संत हित, लीन्ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार ॥
!! श्री जानकी स्तुति !!
भई प्रगट कुमारी, भूमि-विदारी
जन हितकारी भयहारी ।
अतुलित छबि भारी, मुनि-मनहारी
जनकदुलारी सुकुमारी ॥
सुन्दर सिंहासन, तेहिं पर आसन
कोटि हुताशन द्युतिकारी ।
सिर छत्र बिराजै, सखि संग भ्राजै
निज-निज कारज करधारी ॥
सुर सिद्ध सुजाना, हनै निशाना
चढ़े बिमाना समुदाई ।
बरषहिं बहुफूला, मंगल मूला
अनुकूला सिय गुन गाई ॥
देखहिं सब ठाढ़े, लोचन गाढ़ें
सुख बाढ़े उर अधिकाई ।
अस्तुति मुनि करहीं, आनन्द भरहीं
पायन्ह परहीं हरषाई ॥
ऋषि नारद आये, नाम सुनाये
सुनि सुख पाये नृप ज्ञानी ।
सीता अस नामा, पूरन कामा
सब सुखधामा गुन खानी ॥
सिय सन मुनिराई, विनय सुनाई
सतय सुहाई मृदुबानी ।
लालनि तन लीजै, चरित सुकीजै
यह सुख दीजै नृपरानी ॥
सुनि मुनिबर बानी, सिय मुसकानी
लीला ठानी सुखदाई ।
सोवत जनु जागीं, रोवन लागीं
नृप बड़भागी उर लाई ॥
दम्पति अनुरागेउ, प्रेम सुपागेउ
यह सुख लायउँ मनलाई ।
अस्तुति सिय केरी, प्रेमलतेरी
बरनि सुचेरी सिर नाई ॥
निज इच्छा मखभूमि ते प्रगट भईं सिय आय ।
चरित किये पावन परम बरधन मोद निकाय ॥
!! श्री कृष्ण जन्म स्तुति !!
भये प्रगट गोपाला दीनदयाला
यशुमति के हितकारी।
हर्षित महतारी सुर मुनि हारी
मोहन मदन मुरारी ॥
कंसासुर जाना मन अनुमाना
पूतना वेगी पठाई।
तेहि हर्षित धाई मन मुस्काई
गयी जहाँ यदुराई॥
तब जाय उठायो हृदय लगायो
पयोधर मुख मे दीन्हा।
तब कृष्ण कन्हाई मन मुस्काई
प्राण तासु हर लीन्हा॥
जब इन्द्र रिसायो मेघ पठायो
बस ताहि मुरारी।
गौअन हितकारी सुर मुनि हारी
नख पर गिरिवर धारी॥
कन्सासुर मारो अति हँकारो
बत्सासुर संघारो।
बक्कासुर आयो बहुत डरायो
ताकर बदन बिडारो॥
तेहि अतिथि न जानी प्रभु चक्रपाणि
ताहिं दियो निज शोका।
ब्रह्मा शिव आये अति सुख पाये
मगन भये गये लोका॥
यह छन्द अनूपा है रस रूपा
जो नर याको गावै।
तेहि सम नहि कोई त्रिभुवन सोयी
मन वांछित फल पावै॥
नंद यशोदा तप कियो, मोहन सो मन लाय।
देखन चाहत बाल सुख, रहो कछुक दिन जाय॥
जेहि नक्षत्र मोहन भये, सो नक्षत्र बड़िआय।
चार बधाई रीति सो, करत यशोदा माय॥